भावी पीढ़ी से


हम तुम में साकार नहीं तो छिपे हुए हैं। 
तुम भी लेकर नाव हमारे उष्ण रुधिर में 
घूम रहे इच्छाओं की दुनिया टटोलते, 
ले जाने को उसे, तत्त्व जो अविनश्वर है, 
जा सकता है जो कुम्हलाये बिना वहाँ तक 
जहाँ पहुँच तट छोड़ तुम्हें ऊपर आना है। 
ये कुछ भींगे कमल और ये गीली कलियाँ ? 
ऐसी ही थीं, हम सब की ईजाद नहीं हैं। 
जो हम को दे गये, उन्होंने भी पाया था, 
अपने पूर्व पुरुष के हाथों से ऐसा ही । 
जीत वही जो मनु के चरणों में लोटी थी 
हार वही जिसके नीचे वह काँप उठा था। 
रहे धूल पड़ा कि गड्डा में नहलाओ, 
आदम का बेटा आदम का ही बेटा है।

नयी बात क्या कहें ? नया हमने क्या सीखा ? 
उलट पुलट कर शब्द खेल जितने दिखलायें 
किन्तु, बात है यही कि जल ठण्डा होता है, 
और आग पर चढ़ा उसे जितना खौलाओ, 
किन्तु, आग उस पानी से भी बुझ जाती है।

जिज्ञासा का धुआँ उठा जो मनु के सिर से, 
सब के माथे से वह उठता ही आया है, 
घटी बढ़ी, पर, नहीं तनिक नीलिमा गगन की, 
और न बरसा समाधान कोई अम्बर से ।

श्रम है केवल सार, काम करना अच्छा है, 
चिन्ता है दुख भार, सोचना पागलपन है। 
पियो सोम या चाय, नाम में जो अन्तर हो, 
मगर, स्वाद का हाल वही खट्टा - मीठा है।

रामधारी सिंह दिनकर
१९५१ ई०
#RamdhariSinghDinkar 
#writingcommunity 
#ContentOnly

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

रामधारी सिंह दिनकर कविताएं संग्रह

आंकड़ों का आरेखी प्रस्तुतीकरण Part 3 (आंकड़ों का प्रस्तुतीकरण) 11th class Economics

मेसोपोटामिया सभ्यता का इतिहास (लेखन कला और शहरी जीवन 11th class)