जनतन्त्र का जन्म
[ 26 जनवरी,1950 ]
सदियों की ठण्डी बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है;
दो राह, समय के रथ का घर्घर नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।
जनता ? हाँ, मिट्टी की अबोध मूरतें वही,
जाड़े पाले की कसक सदा सहनेवाली,
जब अङ्ग अङ्ग में लगे साँप हों चूस रहे,
तब भी न कभी मुँह खोल दर्द कहनेवाली।
जनता ? हाँ, लम्बी-बड़ी जीभ की वही कसम,
'जनता, सचमुच ही बड़ी वेदना सहती है।"
"सो ठीक, मगर, आखिर इस पर जनमत क्या है ?"
" है प्रश्न गूढ़ जनता इसपर क्या कहती है ?"
मानों, जनता हो फूल जिसे एहसास नहीं,
जब चाहो तभी उतार सजा लो दोनों में ;
अथवा कोई दुधमुँही जिसे बहलाने के
जन्तर - मन्तर सीमित हों चार खिलौनों में।
लेकिन, होता भूडोल, बवण्डर उठते हैं,
जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढ़ाती है;
दो राह, समय के रथ का घर्घर नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।
हुङ्कारों से महलों की नींव उखड़ जाती,
साँसों के बल से ताज हवा में उड़ता है;
जनता की रोके राह, समय में ताव कहाँ ?
वह जिधर चाहती, काल उधर ही मुड़ता है।
अब्दों, शताब्दियों, सहस्राब्द का अन्धकार
बीता; गवाक्ष अम्बर के दहके जाते हैं;
यह और नहीं कोई, जनता के स्वप्न अजय
चीरते तिमिर का वक्ष उमड़ते आते हैं।
सबसे विराट् जनतन्त्र जगत् का आ पहुँचा,
तैंतीस कोटि - हित सिंहासन तैयार करो ;
अभिषेक आज राजा का नहीं, प्रजा का है,
तैंतीस कोटि जनता के सिर पर मुकुट धरो ।
आरती लिये तू किसे ढूँढ़ता है मूरख,
मन्दिरों, राजप्रासादों में, तहख़ानों में ?
देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे,
देवता मिलेंगे खेतों में, खलिहानों में ।
फावड़े और हल राजदण्ड बनने को हैं,
धूसरता सोने से शृङ्गार सजाती है,
दो राह, समय के रथ का घर्घर- नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।
१९५० ई०
रामधारी सिंह दिनकर
#ramdarisinghdinkar
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