व्याल विजय
झूमे ज़हर चरण के नीचे, मैं उमङ्ग में गाऊँ,
तान, तान फण व्याल, कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ
(१)
यह बाँसुरी बजी माया के मुकुलित आकुंचन में,
यह बाँसुरी बजी अविनाशी के संवेश गहन में
अस्तित्वों के अनस्तित्व में, महाशान्ति के तल में,
यह बाँसुरी बजी शून्यासन की समाधि निश्चल में। कम्पहीन तेरे समुद्र में जीवन - लहर उठाऊँ,
तान, तान फण व्याल, कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ
(२)
अक्षय - वट पर बजी बाँसुरी, गगन मगन लहराया,
दल पर विधि को लिये जलधि में नाभि कमल उग आया। जन्मी नव चेतना, सिहरने लगे तत्त्व चलदल - से,
स्वर का ले अवलम्ब भूमि निकली प्लावन के जल से । अपने आर्द्र वसन की वसुधा को फिर याद दिलाऊँ,
तान, तान फण व्याल, कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ ।
(३)
फूली सृष्टि नाद - बन्धन पर, अब तक फूल रही है,
बंसी के स्वर के धागे में धरती झूल रही है ।
आदि छोर पर जो स्वर फूँका, पहुँचा अन्त तलक है, तार-तार में गूँज गीत की, कण कण बीच झलक है। आलापों पर उठा जगत् को भर भर पैंग झुलाऊँ,
तान, तान फण व्याल, कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ ।
(8)
जगमग ओस - विन्दु गुँथ जाते साँसों के तारों में,
गीत बदल जाते अनजाने मोती के हारों में।
जब - जब उठता नाद, मेघ मण्डलाकार घिरते हैं,
आस - पास बंसी के गीले इन्द्रधनुष तिरते हैं।
बाँघूँ मेघ कहाँ बंसी पर ? सुरधनु कहाँ सजाऊँ ?
तान, तान फण व्याल, कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ ।
(५)
इस बंसी के मधुर नाद पर माया डोल चुकी है,
पटावरण कर दूर भेद अन्तर का खोल चुकी है।
झूम चुकी प्रकृति चाँदनी में मादक गानों पर,
नचा चुका हूँ महानर्तकी को इसकी तानों पर ।
विषवर्षी पर अमृतवर्षिणी का जादू दिखलाऊँ,
तान - तान फण व्याल, कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ ।
(६)
उड़े नाद के जो कण ऊपर, वे बन गये सितारे,
जो नीचे रह गये, कहीं हैं फूल, कहीं अङ्गारे।
भींगे अधर कभी बंसी के शीतल गङ्गाजल से,
कभी प्राण तक झुलस उठे हैं इसके हालाहल से । शीतलता पीकर प्रदाह से कैसे हृदय चुराऊँ ?
तान, तान फण व्याल, कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ ।
(७)
यह बाँसुरी बजी, मधु के सोते फूटे मधुवन में,
यह बाँसुरी बजी, हरियाली दौड़ गयी कानन में ।
यह बाँसुरी बजी, प्रत्यागत हुए विहङ्ग गगन से,
यह बाँसुरी बजी, सट कर विधु चलने लगा भुवन से। अमृत सरोवर में धो धो तेरा भी ज़हर बहाऊँ,
तान, तान फण व्याल, कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।
(८)
यह बाँसुरी बजी पनघट पर कालिन्दी के तट में,
यह बाँसुरी बजी मुरदों के आसन पर मरघट में
बजी निशा के बीच आलुलायित केशों के तम में,
बजी सूर्य के साथ यही बाँसुरी रक्त कर्दम में।
कालियदह में मिले हुए विष को पीयूष बनाऊँ,
तान, तान फण व्याल, कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ ।
(९)
फूँक - फूँक विष लपट, उगल जितना हो ज़हर हृदय में, यह बंसी निर्गरल, बजेगी सदा क्षान्ति की लय में । पहचाने किस तरह भला तू निज विष का मतवाला ?
मैं हूँ साँपों की पीठों पर कुसुम लादनेवाला ।
विषदह से चल निकल, फूल से तेरा अङ्ग सजाऊँ।
तान, तान फण व्याल, कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ ।
( १० )
ओ शङ्का के व्याल ! देख मत मेरे श्याम वदन को,
चक्षुः श्रवा ! श्रवण कर बंसी के भीतर के स्वन को। जिसने दिया तुझे विष, उसने मुझको गान दिया है,
ईर्ष्या तुझे उसीने मुझको भी अभिमान दिया है।
इस आशिष के लिए भाग्य पर क्यों न अधिक इतराऊँ ? तान, तान फण व्याल, कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।
(११)
विषधारी ! मत डोल कि मेरा आसन बहुत कड़ा है,
कृष्ण आज लघुता में भी साँपों से बहुत बड़ा है।
आया हूँ बाँसुरी - बीच उद्धार लिये जनगण का,
फण पर तेरे खड़ा हुआ हूँ भार लिये त्रिभुवन का।
बढ़ा, बढ़ा नासिका, रन्ध्र में मुक्ति - सूत्र पहनाऊँ,
तान, तान फण व्याल, कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।
१९४६ ई०
रामधारी सिंह दिनकर
#RamdhariSinghDinkar
टिप्पणियाँ