स्वप्न और सत्य

तबीयत चाहती है, बात कुछ तुमको सुनाऊँ,
मगर, तुम कौन हो जो पंक्ति मेरी पढ़ रहे हो ?

कला के पारखी हो ? चाँदनी के चाहनेवाले ? 
हवा की साँस में जो दर्द है उसको समझते हो ? 
बितायी है कभी क्या पूर्णिमा की रात खेतों में 
खड़ी हरियालियों को देखते, बोले बिना कुछ भी ?

पहाड़ों को कभी क्या देखकर यह भाव जागा है,
तुम्हारी और उनकी रूह आपस में सहेली है ?

सितारों की सभा में बैठते हो ? घूमते हो क्या 
उषा के जावकों में और सन्ध्या के जुही - वन में ? 
जवानी की लटों को देख मन करवट बदलता है ? 
भरे-उभरे बदन से क्या घनों की याद आती है ?

रखा है याद सौ मैं एक कोई गीत वह चुनकर 
कि जिस में रूपसी कोई सरोवर में नहाती हो, 
पलों के दो दलों पर, बाहु - मूलों पर, कपोलों पर 
झलकते फुहारे शुभ्र जल के मोतियों - जैसे, 
कमल दल पर सुबह में जिस तरह शबनम चमकती है ?

बुलाते हैं इशारों से कभी वे स्वप्न तुमको भी 
हमारे हाथ से दो इंच जो आगे बने रहते ? 
न छू सकते जिन्हें हम औ' न जिनको छोड़ ही सकते, 
यही दो इंच की दूरी हजारों कोस बन जाती। 
मगर बेचैनियों रोशनी कैसे उमड़ती है ?

 तुम्हें भी रात के सुनसान में आकाश पर दिखते
 किसी की माँग के मोती, किसी के हाथ का दर्पण ? 
किसी के मुक्त कुन्तल जाल लहराते हुए घन - से 
कि जिनमें से चमेली के हजारों फूल झरते हैं ?

अहा ! क्या बात ? ये आकाशवाली सूरतें भोली, 
कि जिनके नाम से आहट नयी महसूस होती है;
 हृदय में सुगबुगा उठती जुही के फूल - सी कविता, 
लहू में रेंगने लगते हज़ारों साँप सोने के।

सुकेशी, उर्वशी, रम्भा, मृणाली, मेनका, शीला,
 न किसके नाम में बैकुण्ठ सिमटा झिलमिलाता है ?
 न किसके नाम से ही प्राण जगकर बैठ जाते हैं, 
समझकर, यह किसी सङ्गीत की पहली कड़ी होगी ?

ज़रा लो नाम, फिर दोनों दृगों को मूँदकर सूँघो,
तुम्हारे घ्राण में सम्पूर्ण दिव की गन्ध आयेगी।

प्रणय की चिर किशोरी मूर्त्तियों को काम ही क्या है ? 
सदा किलकारियाँ भरना, मचलते खेलते रहना 
कभी मन्दार के नीचे, कभी मन्दाकिनी - तट पर। 
न इसकी आयु बढ़ती है, न इनका रूप घटता है, 
बुढ़ापा क्या ? जवानी ही कभी ढीली नहीं होती।

किसी की कुक्षि की कोपल ? नहीं, ये कल्पनाएँ हैं ।
 निकलती है जवानी की उमङ्गों से परी उस दिन
मनुज का मन भरे मधुमास में जिस रोज़ होता है।

टँगे हैं कल्पना की खूँटियों पर चित्र वे, जिनमें
अछूते रङ्ग में हिलडुल मनुज की प्यास जलती है।

कुहासे में धुएँ में रङ्ग के तूफान पर चढ़कर 
हवा पर दौड़ना भी खूब है आगे अगर कोई 
परी संकेत करती हो कि मन का देवता उगकर 
बुलाता हो तिमिर में फिर बुलाकर डूब जाता हो।

बड़ा आनन्द है रङ्गीनियों के बीच चलने में। 
बुरा क्या है, कभी यदि मेनका के साथ बादल पर 
टहलते - घूमते तुम बेख़बर नीचे फिसल जाओ ? 
अरे, ये मेघ हैं, सड़कें नहीं कंक्रीट पत्थर की, 
गिरो भी तो नहीं तन में तनिक भी चोट लगती है।

बुरा क्या है, किसी दिन घूमते फिरते भटक जाओ, 
गली सूझे नहीं कोई सितारों से निकलने की ? 
मज़े में रात भर घूमो कभी दायें, कभी बायें,
 उमड़ती बाढ़ में ज्यों गाँव की डोंगी निकलती है 
घरों के पास से होकर, बचाकर पेड़ - पौधों को ; 
कि जैसे पर्वतों की गोद में नदियाँ बहा करती
 कि जैसे टापुओं के बीच से जलयान चलते हैं
कि जैसे रेंगते हैं साँप नीचे फूल के वन में,
 कि जैसे नाव 'वेनिस' में गृहों के बीच फिरती है। 
सितारों की ज़मीं पर ओस की अच्छी नमी होगी, 
धुमैली गन्ध बादल की भरेगी ताज़गी मन में ।
 मज़े में रात भर घूमो, मगर, जब भोर होता हो, 
क्षितिज के पास कंचन के सरोवर में उतर जाओ, 
मिटा लो क्लान्ति, रँग लो प्राण को सौरभ भरे जल से,
 उषा को बाँधकर भुज में उतरते - तैरते जाओ, 
क्षितिज के पास से पृथ्वी नहीं दो हाथ भर भी है।

अहा ! पृथ्वी ! धुओं का जाल ऊपर रह गया उन भावनाओं - सा 
उमड़ती हैं घटा सी जो, नहीं पर, हाथ में आती, 
तुम्हारे पाँव के नीचे हुई आवाज़ कुछ ठक - सी ?
 लगा ऐसा कि जैसे नीन्द से तुम जाग बैठे हो ?
 हुआ अनुमान कुछ ऐसा कि जैसे आँख के ऊपर
 हरी ऐनक पड़ी थी जो कहीं वह गिर गयी खुलकर ? अभी तो भोर की भी धूप आँखों में कड़कती है।

यही है ज़िंदगी जिसकी गगन में कामना फैली,
 मगर, जो खुद खड़ी चट्टान से लोहे बजाती है।
 छिटक चिनगारियाँ उड़तीं, वहीं इसके सितारे हैं,
 धुमैली गन्ध जो ऊपर, यहाँ खुशबू पसीने की।

गगन में घूमनेवालो ! जिसे तुम खोजते फिरते 
नहीं वह पूर्णता है शून्य का कीटाणु बनने में।
 बढ़ाओ कल्पना का जाल, तब भी व्योम बाक़ी है, लगाओ तर्क के सोपान, तब भी प्रश्न रहते हैं।
 मृषा ऊहा, वृथा सन्धान, मन का स्वेद यह झूठा, 
अमरता खोजते हो तुम, मगर, मरते चले जाते।
 इधर तुम खींचते अपनी लकीरें वायुमण्डल में, 
उधर आकर निरन्तर शून्य उनको एक कर जाता।

इसीसे तो समझता हूँ कि वे अच्छे रहे हमसे 
नहीं जिनकी लकीरें वायुमण्डल पर, मही पर हैं।
 जिन्होंने पर्वतों को काटकर मैदान कर डाला, 
नदी संकेत पर जिनके सिमटकर गति बदलती है।
 सुबह से शाम तक खट कर पुरुष जो लौटते घर को,

अभी भी वीरता साहस लिये, गौरव भरे मन में ; 
प्रिया से भी नहीं कहते कि मेरी देह दुखती है।

बड़ी कविता कि जो इस भूमि को सुन्दर बनाती है, 
बड़ा वह ज्ञान जिससे व्यर्थ की चिन्ता नहीं होती।
 बड़ा वह आदमी जो ज़िंदगी भर काम करता है,
 बड़ी वह रूह जो रोये बिना तन से निकलती है।

रामधारी सिंह दिनकर


१९५२ ई०

#RamdhariSinghDinkar

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