आनन्दातिरेक

आनन्द का अतिरेक यह ।

हो मृत्यु की धारा अगर तो मुक्त बहने दो मुझे ;
 हो ज़िन्दगी की छाँह तो निस्पन्द रहने दो मुझे।

कुछ और पाना व्यर्थ है, 
अन्यत्र जाना व्यर्थ है।

माँगा बहुत तुम से, नहीं कुछ और माँगूँगा ; 
अब इस महामधु- पूर्ण निद्रा से न जागूँगा ।

नीन्द है वह जागरण जब फूल खिलते हों; 
चेतना के सिन्धु में निश्चेत प्राणों को ;
 ऊर्मियों में फूटते - से गान मिलते हों।

मीठा बहुत उल्लास यह, मादक बहुत अविवेक यह निस्सीम नभ, सागर अगम आनन्द का अतिरेक यह ।

१९५४ ई०
रामधारी सिंह दिनकर
#ramdarisinghdinkar

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