प्रेम


प्रेम न अनुरोध न आज्ञा
यह  है भाववाचक संज्ञा
प्रेम न ज्ञान और नहीं कर्म
यह है स्वभाविक मानव धर्म


प्रेम न मूल्य नहीं प्रार्थना
यह है अंतःकरण की भावना
यह भावना खास नहीं आम है
विश्व में व्याप्त निष्काम है


सांसारिक प्रेम स्वार्थमय है
प्रेमी से बिछुड़न दुखमय है
यथार्थ प्रेम निस्वार्थ है
प्रेम कोई करता नहीं हो जाता है


अच्छा लगना प्यार नहीं
यह तो प्यार की शुरुआत है
धीरे - धीरे प्यार पनपता है
धीरे - धीरे बढ़ता जाता है


अगर विचार नहीं मिलता
जीवन का ढंग बदल जाता है
तब मनोदशा बदल जाती है
प्यार में स्थायित्व नहीं रहता


एक का प्यार जब अंत होता है
दूसरे से प्यार की शुरुआत होती है
कौन प्यारा झूठा कौन सच्चा है ?
यह सोच - विचार कौन करता है ?


जब दो प्रेमी रहते साथ - साथ
भावना उफान पर होती हैं
दोनों के दिलों में बार-बार
प्रेम का लावा धधक उठता है


जब काम में मन नहीं लगता
होठ गुनगुनाने लगते हैं
सूना - सूना संसार लगता है
नींद उखड़ जाती बेचैनी बढ़ती है


जब दिल टूट जाता निराशा होती
प्यार घृणा में बदल जाता है
विवेकशून्य प्रेमी खूंखार होकर
हिंसक जानवर बन जाता है


प्रेमिया स्मृति नहीं अनुभव नहीं
विचार का अंत है विचार नहीं
प्रेम में सुख और आनंद है
प्रेम मानव जीवन में सुगंध है


जब प्यार का विस्तार होता है
आत्मा जगती मानवता आती है
कण - कण से जब प्यार हो जाता
मानवता परमात्मा बन जाता है

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