संदेश

अति का अंत

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किसी भी नर, मनुजों के पार्श्व होता हद से अतिशय विभूति वही जर उसको करती बेसुध अति का अंत तय है भव में। किसी भी चीज का संसृति में मनुष्यों के राँध असीम होता वही ले जाते त्रुटिपूर्ण पंथ पे अति का अंत तय है भव में। किसी भी पदार्थ की गुरुता तभी रहेगी जब किंचित हो ए- परम होने पर न पणता अति का अंत तय है भव में। किसी भी वस्तु का लोक में गरजता से अनाचार होने पे आकृष्ट करती मिथ्या की ओर अति का अंत तय है भव में। किसी भी कोविंद को कभी हद से विपुल इल्म ही उसे ले जाती भूलयुक्त डगर पर अति का अंत तय है भव में किसी भी प्राणीवान जीव को गरज, ताल्लुक से निपट बल कतिपय को करती ए- विनष्ट अति का अंत तय हैं भव मे । अमरेश कुमार वर्मा जवाहर नवोदय विद्यालय बेगूसराय, बिहार

भारतीय युवा

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जब- जब कोई मातम छाते भारतीय युवा सम्मुख आते संकट को कुचल डाल कर प्रीति से रहते भारतीय युवा। भारतीय युवा वर्ग भव में क्या से क्या न कर सकते ? किसी भी द्वेषी में न है हिम्मत भारतीय युवा से टक्कर लेने की। भारतीय युवा से लोहा लेना चाहते जल्दी न कोई जग में ये जो चाहे वे कर सकते यहां चाहे चाँद को लाना हो ज़मीं पे। चाहे कैसी भी उपपाद्य आये भारतीय युवा की होगी जय ये समस्त खल्क भी मान रही भारतीय युवा है कुछ खास । भारतीय युवा की ताकत का संपूर्ण दुनिया मान रही है लोहा भारतीय युवा इस पूर्ण दुनिया में फहराती फिरती परचम है यहां पे। अमरेश कुमार वर्मा जवाहर नवोदय विद्यालय बेगूसराय, बिहार

ईश्वर की जयघोश

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मानें तो हर घटक में ईश्वर न मानो तो किंचित भी न मानो तो पाषाण में कभी कुछ समय के लिए उनमें परमात्मा की आत्मा आती मानने पर प्रत्येक पदार्थ में करता ईश्वर वास इस भव में हम सब करते, ईश्वर की जय। माने तो भूमि भी अर्चना में परम-ए-परमेश्वर बन जाती लगता उनमें आ गया उक्थ उनका पूजा- अर्चना करके मांगते सब मंगलकामनाएं उनके याचना से हम मनुज सब नर – नारी होते यथार्थ तब हम करते ईश्वर की जय। वर्चस्व बरसाने वालों ईश्वर हमारे सबों के कष्ट को पृथक करने वाले क्षुधालु को भोजन, तृषित को पानी देने वाले वही हमारे परम-ए-परमेश्वर जो सच्चे चित्त से इनका करें सत्कार, आराधना इस खलक, जग संसार में उनकी मनोकामना होती है परिपूर्ण तब ही तो सब करते इनकी जयघोश। अमरेश कुमार वर्मा जवाहर नवोदय विद्यालय बेगूसराय, बिहार

माटी के पुतले

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जगत में जिनका हुआ आमद उसको जग से निश्चित ही जाना चाहे लाख यत्न करले कोई भी लेकिन जाना तय है ही भव से क्यों कर रहा लूट काट डकैती ? भले कार्य करो ना हे प्रियतम तू माटी के पुतले हो ही भुवन में एक दिन माटी में ही मिल जाओगे। कोई भी नर, नारी स्वजन को सदा उत्तम बनाए रखना चाहता अपने रूप रंगों को सतत बनाए रखना चाहता इस जग, जहां में अवस्था के साथ- साथ उनका ये युवन रुप झड़ ही जाता यहां तू माटी के पुतले हो इस जग में एक दिन माटी में ही मिल जाओगे। अगर तू हयात दौड़ में तबदील ही कर ही बैठा तो अब क्या सोचना अपने उत्तम कार्यों के द्वारा ही हम अपने यश को पूर्ण विश्व में फैलाएं खलक से जाने के पश्चात भी हमें कर्म से ही याद किया जाएगा यहां तू माटी के पुतले हो इस जहांन में एक दिन माटी में ही मिल जाओगे। अमरेश कुमार वर्मा जवाहर नवोदय विद्यालय बेगूसराय, बिहार

ए- वृहत् महामारी गरीबी

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इस जिंदगानी में गरीबी क्या से क्या करवा सकती ? गरीबी एक दैन्य समस्या जो छाई हुई पूर्ण भारत में भारत ही ऐसा मुल्क नहीं जहां निर्धन को भूखे हमल सोना पड़ता फुटपाथों पर गरीबी एक वृहत् महामारी । गरीबी का नाम सुन के और मनन कर – कर के अभी भी इन विलोचन से आँसू की धारा श्रवनाती क्या कर सकता हूं मैं कैसे ऐसे- ऐसे लाखों, करोड़ों को बचा सकता हूं गरीबी एक विपुल समस्या। मैंने खुद देखा भव में अपनी नग्न नयनों से गरीबी क्या होती ? आज भी देख रहा हूं निर्धन भूखे बच्चों को जिसकी उम्र नादानी की वह अपना कुक्ष पालन हेतु भीख न मांगकर, करता श्रम न के सम करता मदद इन्हें कोय। अमरेश कुमार वर्मा जवाहर नवोदय विद्यालय बेगूसराय, बिहार

बदलती दुनिया

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हमारी ये जगत, ख़लक है पूरी तरह कुंडलाकार हर लम्हे के संग संग ये बदलती रही है ये भुवन दुनिया में न कोई एदुजा अपना इस जग संसार में। इस जहान के कई अनूठा दिलजस्वी मजेदार दास्ताँ जिससे पता चलता यहां इस भू, धरा की इतिहास इतिवृत से हम मनुजों को पूर्ववृत्तांत की अभिज्ञता । लोक पर कब हयातों की शुरुआत हुई इस भव में इसका भी कूत, कयास लगाना भी बड़ी दुस्साध्य हमारे वैज्ञानिकों की यत्न सतत बदल रही है दुनिया । अमरेश कुमार वर्मा जवाहर नवोदय विद्यालय बेगूसराय, बिहार

लूटपातों की हयात

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भारत में लूटपातों की अदद एक – दो न बीस – इक्कीस इसकी अदद विपुल वृहत् इस निरुपम से खलक में लूटपातों की हयात जग में बड़ी वेदना पूर्ण भरी होती वो कैसे स्वजन कार्यों को देते होंगे अंजाम भव में ? मेरा मानस सोच सोचके सहृदय निज दग्ध हो जाती हर वक्त- वक्त लूटपातों को सतत सावधान रहना पड़ता। लूटपातों की सुकुमार हयात उनकी भी क्या होगी जिंदगी ? कितने कष्टों , दुःखो से भरी लूटपाटों करने वाले का चित्त ए-दिवा वो भी भला इंसा होगा उसका त्रुटि पूर्ण परिवेश ही उस मनुजों, मनुष्य को वैसा बना देती लुटेरा, चोर, डकैत जब वह नादुरुस्त डगर का कर रहा होगा इंतख़ाब इसका उसको कोई भी स्वजन, दूजा अक्ष न आता होगा इस भव में। अमरेश कुमार वर्मा जवाहर नवोदय विद्यालय बेगूसराय, बिहार

भारत की जाति व्यवस्था

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समानता- वैषम्य का भेदन न करना चाहिए इ- भव में सभी नर, मनुष्य को यहां इस जगत, संसार, सृष्टि में सभी को समीपस्थ रूप से है समानता का अधिकार। तुल्यता का अधिकार सबको दिया है भारत के संविधान में सब को इस स्वतंत्र भारत देश में अपनी उड़ान भरने का है प्रभुत्व समानता, समानता, समानता का स्वत्व बाबा साहब ने दिया सबको। पिछली जाति, लिंग, मत भेदन के आधार पर बाबा साहब ने दिए तंद्रा आगे लाने किए है प्रयास, कोशिश यह महज उन्होंने उत्तम तरकीब लगाकर तुल्य करने की कोशिश समानता, समानता ही जिंदगानी । लिंग भेदन जाति का भेद को उन्होंने पूरी तरह नष्ट करने की याथा संभव की किए प्रयत्न आज भी चंद नरों को छोड़ पूरी तरह से जाति व्यवथा खत्म हो गई आज भारत में। अमरेश कुमार वर्मा जवाहर नवोदय विद्यालय बेगूसराय, बिहार

घुतिवान- ए- मनुज

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किसी भी नर, मनुजों को उत्तम, अधम कार्य से ही उनको मिलती है पहचान यथार्थ के पंथ पर चल के श्रेष्ठ कार्यों से बनाए द्योतक तब भव में होगी घुतिवानता । किसी को इस खलक में चमकने के लिए उनको करना पड़ेगा श्रम, तपस्या अथक श्रम से अनाचार ही बुद्धिमत्ता पूर्वक करे कार्य तब घुतिवान होगी ये जगत । ऐसे ही न घुति होती कोई इस अनूठा भुवन में कोय उससे लिए सतत परिश्रम करता पड़ता है इस जग में हर एक घुतिवान मनुजों के पार्श्व होती लाखों, हजारों गुण। घुतिवान मनुषों की पहचान अलग ही होती इस भव में उनका प्रभाव होता अनोखा होती है इस भव्य संसार में घुतिवान बनने के लिए हमें सदा श्रम की पड़ती अपेक्षित । अमरेश कुमार वर्मा जवाहर नवोदय विद्यालय बेगूसराय, बिहार

संतुलन-ए-धरा

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हर चीज का इस भुवन में होना चाहिए उचित साम्य साम्यवस्था में रहने से ही सब कुछ ठीक होगी यहां। समभार के बिना ये हयात कभी न हो पाएगी संभव उचित मात्रा हर चीज की होती है अपेक्षित जग में। कोई भी वस्तु को जहाँ में ज्यादती होने से खलक में न हो पाएगी इस जग, सृष्टि, खल्क, धरा पर जीवन संभव। असंतुलनता चाहे किसी भी हो किसी प्रेतात्मा में हो या कुछ में खाद्यय में तीक्ष्ण की अधिकता तो होता अपना खाद्यय स्तब्ध। धरा पर अगर किसी प्राणी की किसी सबब हो जाए असंतुलन न बचेगी कोई प्राणीवान भव में वहीं से अंत इब्तिदा इस युग की। सतत बनाए रखे समरसता हर चीज की पड़ती गरजता संतुलन संतुलन संतुलन ही इन धरा की होती आकर्षिता। अमरेश कुमार वर्मा जवाहर नवोदय विद्यालय बेगूसराय, बिहार

ए- अनूठा- हयात ईश्वरी देन

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किसी भी कृत्य, कार्य को अंजाम देने के लिए हमें होना चाहिए हमारे पार्श्व इस हयात में जोश, आवेग तब ही हम अपनें कार्य को दे सकते है हमसब अंजाम। किसी उत्तम हो या अधम करतब को करने में हमें कई तरह के मारफ़त से करवाया जा सकता यहां तृष्णा, लिप्सा, आक्रोश में अधर्म का पंथ होता आसां। किसी को कुछ करने में पड़ती जोश की गरजता किसी के दबाव में अक्सर हमें करना पड़ता हेय ‍कार्य उससे होगी बेवजीह हमारी सतत अपनाए उत्तम डगर । किसी को अपना सखावर हमें सोच समझकर बनानी चाहिए मित्र जैसा रहेगा वैसा ही हम सम्मुख जिंदगानी में हो जायेगे आक्रोश में ना ले कोई अद्ल ए- अनूठा- हयात ईश्वरी देन । अमरेश कुमार वर्मा जवाहर नवोदय विद्यालय बेगूसराय, बिहार

विपथगा

 झन-झन-झन-झन-झन - झनन-झनन,  झन-झन-झन-झन-झन - झनन-झनन । मेरी पायल झनकार रही तलवारों की झनकारों में,  अपनी आगमनी बजा रही मैं आप क्रुद्ध हुङ्कारों में,  मैं अहङ्कार - सी कड़क ठठा हँसती विद्युत् की धारों में,  बन काल - हुताशन खेल रही पगली मैं फूट पहाड़ों में अँगड़ाई में भूचाल, साँस में लङ्का के उनचास पवन । झन-झन-झन-झन-झन - झनन-झनन । मेरे मस्तक के आतपत्र खर काल - सर्पिणी के शत फन, मुझ चिर - कुमारिका के ललाट में नित्य नवीन रुधिर - चन्दन,  आँजा करती हूँ चिता- धूम का दृग में अन्ध तिमिर - अंजन,  संहार - लपट का चीर पहन नाचा करती मैं छूम - छनन । झन-झन-झन-झन-झन - झनन-झनन । पायल की पहली झमक, सृष्टि में कोलाहल छा जाता है,  पड़ते जिस ओर चरण मेरे, भूगोल उधर दब जाता है,  लहराती लपट दिशाओं में, खलभल खगोल अकुलाता है,  परकटे विहग - सा निरवलम्ब गिर स्वर्ग - नरक जल जाता है,  गिरते दहाड़ कर शैल - शृङ्ग मैं जिधर फेरती हूँ चितवन । झन-झन-झन-झन-झन झनन-झनन रस्सों से कसे जवान पाप- प्रतिकार न जब कर पाते हैं,  बहनों की लुटती लाज देखकर काँप-काँप रह जाते हैं, ...

कविता__का__हठ (हुङ्कार से)

"बिखरी लट, आँसू छलके, यह सस्मित मुख क्यों दीन हुआ ?  कविते ! कह, क्यों सुषमाओं का विश्व आज श्री - हीन हुआ ?  सन्ध्या उतर पड़ी उपवन में ? दिन - आलोक मलीन हुआ ?  किस छाया में छिपी विभा ? श्रृङ्गार किधर उड्डीन हुआ ? इस अविकच यौवन पर रूपसि, बता, श्वेत साड़ी कैसी ?  आज असङ्ग चिता पर सोने की यह तैयारी कैसी ?  आँखों से जलधार, हिचकियों पर हिचकी ज़ारी कैसी ?  अरी बोल, तुझ पर विपत्ति आयी यह सुकुमारी! कैसी ?" यों कहते - कहते मैं रोया, रुद्ध हुई मेरी वाणी,  ढार मार रो पड़ी लिपट कर मुझ से कविता कल्याणी ।  "मेरे कवि ! मेरे सुहाग! मेरे राजा ! किस ओर चले ?  चार दिनों का नेह लगा रे छली ! आज क्यों छोड़ चले ? "वन - फूलों से घिरी कुटी क्यों आज नहीं मन को भाती ?  राज - वाटिका की हरीतिमा हाय, तुझे क्यों ललचाती ?  करुणा की मैं सुता बिना पतझड़ कैसे जी पाऊँगी ?  कवि ! वसन्त मत बुला, हाय, मैं विभा बीच खो जाऊँगी। "खँडहर की मैं दीन भिखारिन, अट्टालिका नहीं लूँगी,  है सौगन्ध, शीश पर तेरे रखने मुकुट नहीं दूंगी।  तू जायेगा उधर, इधर मैं रो-रो दिवस बि...

फूलों__के__पूर्व__जन्म (हुङ्कार से)

प्रिय की पृथुल जाँघ पर लेटी करती थीं जो रँगरलियाँ, उनकी क़ब्रों पर खिलती हैं नन्हीं जूही की कलियाँ। पी न सका कोई जिनके नव अधरों की मधुमय प्याली, वे भौंरों से रूठ झूमतीं बन कर चम्पा की डाली। तनिक चूमने से शरमीली सिहर उठी जो सुकुमारी, सघन तृणों में छिप उग आयी वह बन छुई- मुई प्यारी। जिनकी अपमानित सुन्दरता चुभती रही सदा बन शूल,  वे जगती से दूर झूमतीं सूने में बन कर वन-फूल । अपने वलिदानों से जग में जिनने ज्योति जगायी है,  उन पगलों के शोणित की लाली गुलाब में छायी है। अबुध वत्स जो मरे हाय, जिन पर हम अश्रु बहाते हैं,  वे हैं मौन मुकुल अलबेले खिलने को अकुलाते हैं ! -- रामधारी सिंह दिनकर

सिपाही (हुङ्कार से)

वनिता की ममता न हुई, सुत का न मुझे कुछ छोह हुआ,  ख्याति, सुयश, सम्मान, विभव का, त्योंही, कभी न मोह हुआ।  जीवन की क्या चहल - पहल है, इसे न मैंने पहचाना,  सेनापति के एक इशारे पर मिटना केवल जाना। मसि की तो क्या बात ? गली की ठिकरी मुझे भुलाती है,  जीते जी लड़ मरूँ, मरे पर याद किसे फिर आती है ?  इतिहासों में अमर रहूँ, है ऐसी मृत्यु नहीं मेरी,  विश्व छोड़ जब चला, भुलाते लगती फिर किसको देरी ? जग भूले, पर मुझे एक, बस, सेवा - धर्म निभाना है,  जिसकी है यह देह उसीमें इसे मिला मिट जाना है।  विजय - विटप को विकच देख जिस दिन तुम हृदय जुड़ाओगे,  फूलों में शोणित की लाली कभी समझ क्या पाओगे ? वह लाली हर प्रात क्षितिज पर आकर तुम्हें जगायेगी,  सायंकाल नमन कर माँ को तिमिर- बीच खो जायेगी।  देव करेंगे विनय, किन्तु, क्या स्वर्ग - बीच रुक पाऊँगा ?  किसी रात चुपके उल्का बन कूद भूमि पर आऊँगा। तुम न जान पाओगे, पर, मैं रोज खिलूँगा इधर - उधर,  कभी फूल की पंखुड़ियाँ बन, कभी एक पत्ती बनकर।  अपनी राह चली जायेगी वीरों की सेना रण में,  रह जाऊँगा मौ...

परिचय (हुङ्कार से)

सलिल-कण हूँ कि पारावार हूँ मैं ?  स्वयं छाया, स्वयं आधार हूँ मैं।  बँधा हूँ, स्वप्न है, लघु वृत्त में हूँ,  नहीं तो व्योम का विस्तार हूँ मैं। समाना चाहती जो बीन - उर में,  विकल वह शून्य की झङ्कार हूँ मैं।  भटकता, मैं खोजता हूँ ज्योति तम में,  सुना है, ज्योति का आगार हूँ मैं। जिसे निशि खोजती तारे जला कर,  उसी का कर रहा अभिसार हूँ मैं।  जनम कर मर चुका सौ बार लेकिन,  अगम का पा सका क्या पार हूँ मैं ? कली की पंखुड़ी पर ओस - कण में  रँगीले स्वप्न का संसार हूँ मैं ;  मुझे क्या आज ही या कल झडूं मैं ?  सुमन हूँ, एक लघु उपहार हूँ मैं। जलन हूँ, दर्द हूँ, दिल की कसक हूँ,  किसी का हाय, खोया प्यार हूँ मैं।  गिरा हूँ भूमि पर नन्दन - विपिन से,  अमर - तरु का सुमन सुकुमार हूँ मैं। मधुर जीवन हुआ कुछ प्राण ! जब से  लगा ढोने व्यथा का भार हूँ मैं । रुदन ही एक पथ प्रिय का, इसी से,  पिरोता आँसुओं का हार हूँ मैं। मुझे क्या गर्व हो अपनी विभा का ?  चिता का धूलि कण हूँ, क्षार हूँ मैं।  पता मेरा तुम्हें मिट्टी कहेगी ...

पतझड़__की__सारिका (रसवन्ती से)

सूखे विटप की सारिके ! उजड़ी - कटीली डार से मैं देखता, किस प्यार से  पहना नवल पुष्पाभरण  तृण, तरु, लता, वनराजि को,  हैं जा रहे विहसित - वदन  ऋतुराज मेरे द्वार से । मुझ में जलन है, प्यास है,  रस का नहीं आभास है,  यह देख हँसती वल्लरी,  हँसता निखिल आकाश है। जग तो समझता है यही,  पाषाण में कुछ रस नहीं,  पर, गिरि - हृदय में क्या न  व्याकुल निर्झरों का वास है ? बाकी अभी रसनाद हो,  पिछली कथा कुछ याद हो,  तो कूक पंचम तान में,  संजीवनी भर गान में। सूखे विटप की डार को  कर दे हरी करुणामयी ;  पढ़ दे ऋचा पीयूष की, उग जाय फिर कोंपल नयी ; जीवन - गगन के दाह में  उड़ चल सजल नीहारिके !  सूखे विटप की सारिके ! १९३६ ई० -- रामधारी सिंह दिनकर

गीत- शिशु (रसवन्ती से)

आशीर्वचन कहो मङ्गमयि, गायन चले हृदय से,  दुर्वासन अवनि ! किरण मृदु, उतरो नील निलय से।  बड़े यत्न से जिन्हें छिपाया ये वे मुकुल हमारे,  जो अब तक बच रहे किसी विध ध्वंसक इष्ट - प्रलय से। ये अबोध कल्पक के शिशु क्या रीति जगत् की जानें,  कुछ फूटे रोमांच - पुलक से, कुछ अस्फुट विस्मय से।  निज मधु - चक्र निचोड़ लगन से पाला इन्हें हृदय ने,  बड़े नाज़ से,बड़ी साध से, ममता, मोह, प्रणय से। चुन अपरूप विभूति सृष्टि की मैंने रूप सँवारा,  उडु से द्युति, गति बाल लहर से, सौरभ रुचिर मलय से।  सोते - जगते मृदुल स्वप्न में सदा किलकते आये,  नहीं उतारा कभी अङ्क से कठिन भूमि के भय से। नन्हें अरुण चरण ये कोमल, क्षति की परुष प्रकृति है,  मुझे सोच, पड़ जाय कहीं पाला न कुलिश निर्दय से।  अर्जित किया ज्ञान कब इनने, जीवन - दुख कब झेला ?  अभी अबुध ये खेल रहे थे रजकण के संचय से। सीख न पाये रेणु - रत्न का भेद अभी ये भोले,  मुट्ठी भर मिट्टी बदलेंगे कंचन - रचित वलय से ।  कुछ न सीख पाये, तो भी रुक सके न पुण्य - प्रहर में,  घुटनों बल चल पड़े, पुकारा तु...

गीत- अगीत (रसवन्ती से)

गीत, अगीत, कौन सुन्दर है ?              (१) गाकर गीत विरह के तटिनी  वेगवती बहती जाती है,  दिल हलका कर लेने को  उपलों से कुछ कहती जाती है।  तट पर एक गुलाब सोचता,  "देते स्वर यदि मुझे विधाता,  अपने पतझर के सपनों का  मैं भी जग को गीत सुनाता।" गा - गा कर बह रही निर्झरी,  पाटल मूक खड़ा तट पर है।  है गीत, अगीत, कौन सुन्दर है ?                 (२) बैठा शुक उस घनी डाल पर  जो खोंते पर छाया देती,  पंख फुला नीचे खोंते में  शुकी बैठ अण्डे है सेती ।  गाता शुक जब किरण बसन्ती  छूती अङ्ग पर्ण से छन कर,  किन्तु, शुकी के गीत उमड़ कर  रह जाते सनेह में सनकर । गूँज रहा शुक का स्वर वन में,  फूला मग्न शुकी का पर है गीत,  अगीत, कौन सुन्दर है ?       (३) दो प्रेमी हैं यहाँ, एक जब बड़े साँझ आल्हा गाता है,  पहला स्वर उसकी राधा को घर से यहाँ खींच लाता है। चोरी -  चोरी खड़ी नीम की छाया में छिपकर सुनती है, 'हुई न क्यों मैं कड़ी ग...

बालिका__से__बधू (रसवन्ती से)

माथे में सेंदुर पर छोटी दो बिन्दी चमचम - सी,  पपनी पर आँसू की बूँदें मोती-सी, शबनम - सी।  लदी हुई कलियों से मादक टहनी एक नरम- सी,  यौवन की विनती - सी भोली, गुमसुम खड़ी शरम- सी । पीला चीर, कोर में जिसकी चकमक गोटा - जाली,  चली पिया के गाँव उमर के सोलह फूलों वाली।  पी चुपके आनन्द, उदासी भरे सजल चितवन में,  आँसू में भींगी माया चुपचाप खड़ी आँगन में। आँखों में दे आँख हेरती हैं, उसको जब सखियाँ,  मुस्की आ जाती मुख पर, हँस देतीं रोती अँखियाँ।  पर, समेट लेती शरमाकर बिखरी - सी मुसकान,  मिट्टी उकसाने लगती है अपराधिनी -  समान । भींग रहा मीठी उमङ्ग से दिल का कोना - कोना,  भीतर - भीतर हँसी देख लो, बाहर - बाहर रोना ।  तू वह, जो झुरमुट पर आयी हँसती कनक - कली - सी,  तू वह, जो फूटी शराब की निर्झरिणी पतली - सी । तू वह, रच कर जिसे प्रकृति ने अपना किया सिँगार,  तू वह जो धूसर में आयी सबुज रङ्ग की धार ।  माँ की ढीठ दुलार ! पिता की ओ लजवन्ती भोली,  ले जायगी हिया की मणि को अभी पिया की डोली । कहो, कौन होगी, इस घर की तब शीतल उजियारी ?...