प्रतिबिम्ब




आईन में देखा जब तस्वीर
चाहा यथार्थता को प्रतिपल
छिपा लूँ किन्तु छिप न सका
टेढ़ी – मेढ़ी लकीर भी
दिख गया तकदीर के

कोहरिल कालिख पतझर के
झुर्रियाँ उग आएँ काले – काले
गर्वीली निगाहों को देख
मदहोश बन बैठा उन्मादों के

उलझनें भी आयी चुभ पड़ी तत्क्षण
न जाने क्या कुढ़न कलङ्कित ?
तिमिर में भी क्या कभी पुष्प खिला ?
अश्रु भी चक्षु में नहीं कब से

धुएँ अंधेरी के जरा सी उँड़ेल
चिन्मय भी प्रचण्ड पथ – पथ के
अंतर देखूँ तो स्पर्धा से जलता हूँ
ऊपर देखूँ तो या भीतर के भव

तरङ्गित कर छायी उषा में खग
ध्रुवों पर अटल चिरता प्रतिबिम्ब
उत्तमता ऐब देख पिराती परिवेष्टित
मँडराती भवितव्यता भार पर हूँ अशक्त

बेला कहाँ वसन्त के झेलूँ भी कैसे ?
यह उजियाला लौट चला प्रतिची से
रश्मि की बाट क्यों देखूँ तब से ?
गूढ़ जीवन अमरता छू लूँ कहाँ से ?

तृषित धरा गगन गरल नील भी नीरस
नीले नभ में भोर तरणि कहाँ ओझिल ?
टूटता कलित तारों से बिछोह सन्ताप
क्रन्दन रस बिखर गया घनघोर में
अपरिचित झिलमिल विभावरी तट के

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